मेरा नाम संजय कुमार यादव है। मैं विज्ञान का विद्यार्थी हूँ — प्राणी विज्ञान से एम.एससी. और अब बायोकैमिस्ट्री में शोधरत। तीन वर्ष मैंने विश्वविद्यालय की प्रयोगशाला को दिए। उन तीन वर्षों में मेरी दुनिया टेस्ट-ट्यूब, माइक्रोपिपेट, सेंट्रीफ्यूज और रिसर्च पेपर तक सीमित थी। मैं कोशिकाओं के भीतर जीवन की रासायनिक कहानी खोज रहा था। पर जीवन ने मेरे लिए एक अलग प्रयोग तैयार कर रखा था। एक दिन पिता की सड़क दुर्घटना ने सब बदल दिया। पैर में फ्रैक्चर, फिर पक्षाघात… और धीरे-धीरे उनका शरीर आधा साथ छोड़ने लगा। माँ पहले ही इस दुनिया से जा चुकी थीं। घर की दीवारें अचानक बहुत बड़ी और जिम्मेदारियाँ बहुत भारी लगने लगीं। मैं प्रयोगशाला से घर लौटा — अस्थायी रूप से, ऐसा सोचा था। पर यह “अस्थायी” समय की स्थायी परीक्षा बन गया। सुबह बीपी मशीन की रीडिंग से दिन शुरू होता। दोपहर दवाइयों की सूची और अस्पताल के चक्कर। रात को उनके पास बैठकर उनकी याददाश्त और मनोबल संभालना। कभी-कभी लगता था कि मैं बायोकैमिस्ट्री नहीं, जीवन की केमिस्ट्री पढ़ रहा हूँ — जहाँ हर दिन एक नई प्रतिक्रिया (reaction) होती है, और मैं स्वयं उस प्रतिक...
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